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३३ कोटि देवता

३३ कोटि देवता

हिंदू धर्म में ३३ कोटि या ३३ करोड़: देवी-देवताओं की संख्या का रहस्य

भूमिका

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनंत सागर में देवताओं का जगत एक आकर्षक विषय है, जो सदियों से साधकों, विद्वानों और भक्तों को मोहित करता आ रहा है। इस गहरे देवता जगत में, हमें “३३ कोटि देवता” की गूढ़ अभिव्यक्ति का सामना करना पड़ता है, जो प्राचीन हिंदू शास्त्रों और धार्मिक विश्वासों में निहित है।

हालांकि, “३३ कोटि देवता” शब्द का व्याख्यान अक्सर गलत समझा जाता है। यह केवल 33 करोड़ (330 मिलियन) देवताओं की गणना नहीं है, क्योंकि शब्द “कोटि” वर्ग, प्रकार या पहलू को भी दर्शाता है। इसलिए, यह वाक्य विशेषता बताता है कि हिन्दू धर्म में पूजा की जाने वाली विभिन्न दिव्य अभिव्यक्तियों की विस्तृत और विविध संख्या को संकेत करती है।

इस ब्लॉग पोस्ट में, हम “३३ कोटि देवता” के जटिल जगत की खोज पर निकटता बढ़ाते हैं, हिंदू कॉस्मोलॉजी में अपनी मूलभूत भूमिका निभाने वाले देवताओं के बारे में चर्चा करते हैं।

वैदिक विद्वानों अनुसार

वेदों में जिन देवताओं का उल्लेख किया गया है उनमें से अधिकतर प्राकृतिक शक्तियों के नाम है जिन्हें देव कहकर संबोधित किया गया है। दरअसल वे देव नहीं है। देव कहने से उनका महत्व प्रकट होता है। उक्त प्राकृतिक शक्तियों को मुख्‍यत: आदित्य समूह, वसु समूह, रुद्र समूह, मरुतगण समूह, प्रजापति समूह आदि समूहों में बांटा गया हैं |

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कुछ जगह पर वैदिक ऋषि इन प्रकृतिक शक्तियों की स्तुति करते हैं और कुछ जगह पर वे अपने ही किसी महान पुरुष की इन प्रकृतिक शक्तियों से तुलना करके उनकी स्तुति करते हैं।  वैदिक विद्वानों अनुसार 33 प्रकार के अव्यय या पदार्थ होते हैं जिन्हें देवों की संज्ञा दी गई है। ये 33 प्रकार इस अनुसार हैं:-

आठ वसु

वसु अर्थात हमें वसाने वाले आत्मा का जहां वास होता है। ये आठ वसु हैं: धरती, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य और नक्षत्र। ये आठ वसु प्रजा को वसाने वाले अर्थात धारण या पालने वाले हैं।

ग्यारह रुद्र

दरअसल यह रुद्र शरीर के अव्यय है। जब यह अव्यय एक-एक करके शरीर से निकल जाते हैं तो यह रोदन कराने वाले होते हैं। अर्थात जब मनुष्य मर जाता है तो उसके भीतर के यह सभी ११  रुद्र निकल जाते हैं जिनके निकलने के बाद उसे मृत मान लिया जाता है। तब उसके सगे-संबंधी उसके समक्ष रोते हैं। शरीर से निकलने वाले इन रुद्रों ने नाम हैं:- प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कुर्म, किरकल, देवदत्त और धनंजय। प्रथम पांच प्राण और दूसरे पांच उपप्राण हैं अंत में ११ वां जीवात्मा हैं। ये ११  जब शरीर से निकल जाते हैं तो सगे-संबंधी रोने लग जाते हैं। इसीलिए इन्हें कहते हैं रुद्र। रुद्र अर्थात रुलाने वाला।

ग्यारह आदित्य

आदित्य सूर्य को कहते हैं। भारतीय कैलेंडर सूर्य पर ही आधारित है। समय के १२ माह को १२  आदित्य कहते हैं। इन्हें आदित्य इसलिए कहते हैं क्योंकि यह हमारी आयु को हरते हैं। जैसे-जैसे समय बढ़ता जाता है हमारी आयु घटती जाती है। ये बारह आदिय १२  माह के नाम हैं। सूर्य की १२  रश्मियों को भी इन्हीं की श्रेणी में रखा गया है।

एक इंद्र

इंद्र का अर्थ बिजली या ऊर्जा।

एक यज्ज

यज्ज अर्थात प्रजापति, जिससे वायु, दृष्टि, जल और शिल्प शास्त्र हमारा उन्नत होता है, औषधियां पैदा होती है।

८ वसु + ११ रुद्र+ १२ आदित्य +  १ इंद्र + १ यज्ज = ३३ कोटी देवता

ये ३३ कोटी अर्थात ३३ प्रकार के अव्यव हैं जिन्हें देव कहा गया। देव का अर्थ होता है दिव्य गुणों से युक्त। हमें ईश्वर ने जिस रूप में यह ३३ पदार्थ दिए हैं उसी रूप में उन्हें शुद्ध, निर्मल और पवित्र बनाए रखना चाहिए।

पौराणिक मत अनुसार

निश्चित ही प्राकृतिक शक्तियों के कई प्रकार हो सकते हैं लेकिन हमें यह नहीं भुलना चाहिए की इन प्राकृतिक शक्तियों के नाम हमारे देवताओं के नाम पर ही रखे गए हैं। जैसे चंद्र नामक एक देव है और चंद्र नामक एक ग्रह भी है। इस ग्रह का नामकरण चंद्र नामक देव के नाम पर ही रखा गया है। इस तरह के देवों का उनके नाम के ग्रहों पर आधिपत्य रहा है।
इसी तरह ये रहे प्रमुख 33 देवता:-

१२आदित्य 

1.अंशुमान, 2.अर्यमन, 3.इन्द्र, 4.त्वष्टा, 5.धातु, 6.पर्जन्य, 7.पूषा, 8.भग, 9.मित्र, 10.वरुण, 11.विवस्वान और 12.विष्णु।

८ वसु

             1.आप, 2.ध्रुव, 3.सोम, 4.धर, 5.अनिल, 6.अनल, 7.प्रत्यूष और 8. प्रभाष।

११ रुद्र

              1.शम्भु, 2.पिनाकी, 3.गिरीश, 4.स्थाणु, 5.भर्ग, 6.भव, 7.सदाशिव, 8.शिव, 9.हर, 10.शर्व और 11.कपाली।

२ अश्विनी कुमार

             1.नासत्य और 2.द्स्त्र। कुछ विद्वान इन्द्र और प्रजापति की जगह 2 अश्विनी कुमारों को रखते हैं। प्रजापति ही ब्रह्मा हैं।
१२आदित्य+ ८ वसु + ११ रुद्र +२ अश्विनी कुमार = ३३ कोटी देवता

निष्कर्ष

इस ब्लॉग पोस्ट में हमने ३३ कोटि देवताओं के बारे में जानकारी प्राप्त की। हम उम्मीद करते हैं कि यह पोस्ट आपको प्रेरित करेगी और आपको इन देवताओं के विषय में और भी गहराई से अध्ययन करने के लिए प्रेरित करेगी।

आपके सभी संदेश और आपकी भक्ति के लिए हम आपका आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद!

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